अहिंसा का दर्शन और गांधी

अहिंसा गांधी जी के जीवन का मूल आधार था । अहिंसा को अपना धर्म मानने वाले मोहन दास कर्म चंद गांधी स्वाधीनता संग्राम के राजनैतिक और आध्यात्मिक नेता थे । सत्याग्रह, अहिंसा और सादगी को ही एक सफल मनुष्य जीवन का मूलमंत्र मानने वाले गांधी जी के इन्ही आदर्शाे से प्रभावित होने के बाद रविंद्र नाथ टैगोर ने पहली बार उन्हें महात्मा अर्थात महान आत्मा का दर्जा दिया था। नेता जी सुभाष चंद्र बॉस ने उन्हें राष्ट्रपिता कह कर पुकारा। गांधी जी के अहिंसा के सिद्धांत एवं उसके प्रयोग की जितनी आवश्यकता उनके जीवित रहते थी आज इसकी आवश्यकता उससे ज्यादा महसूस की जा रही है । गांधी जी की अहिंसा लोगो को समाज से विमुक्त नही करती बल्कि उसे समाज में अहिंसा के प्रयोग करने को प्रेरित करती है । गाँधीवादी अहिंसा मुख्य रूप से आध्यात्मिक लक्ष्य तथा गौण रूप से राजनीतिक व सामाजिक लक्ष्यों से प्रेरित होने के कारन आधुनिक समाज में भी अपनी लोकप्रियता को बरकरार रखे हुए है ।

एक नेता व विचारक के रूप में गांधी जी की महानता इस बात में निहित थी की उन्होंने अहिंसा के व्यक्तिपरक संदेश को जन आंदोलन की सफल तकनीक में बदल दिया । गांधी जी से पहले भगवान महावीर व गौतम बुद्ध ने अहिंसा को व्यक्तिगत क्रिया से जोड़ा था लेकिन गांधी जी ने उसे एक सामाजिक व राजनीतिक तकनीक में बदल दिया । गांधी जी के विचार में राजनीति में सुधार का सर्वाेत्तम साधन अहिंसा ही हो सकता है । अहिंसा दुसरो को कष्ट, हानि या चोट पहुँचाने से बचना मात्र नहीं है बल्कि यह सकारात्मक आत्म-बलिदान है । गांधी जी सम्पूर्ण विश्व को परिवार मानते हुए अहिंसा को वैश्विक शांति व एकता को सुनिश्चित करने वाली एक अनिवार्य ताकत मानते थे । गांधी जी प्रत्येक मानव को ईश्वर की संतान मानते थे । इसलिए किसी भी जीव को किसी भी रूप में सताने को वह उस व्यक्ति के दैवीय रूप का अपमान मानते थे और इस प्रकार व्यापक कलंक को वे इस सम्पूर्ण विश्व को चोट पहुँचाने के समान मानते थे ।
गांधी जी के विचारो में अहिंसा एक आत्मिक शक्ति है । यह बह शक्ति है जो सत्यता पर आधारित है और जिसका उद्देश्य नैतिक और आध्यात्मिक शक्ति से बुराई का सामना करना है । घोर से घोर हिंसा का मुकाबला भी सर्वाेच्च अहिंसा से किया जा सकता है । अहिंसा का दुर्बलता से दूर-दूर तक भी कोई लेना-देना नही है । गांधी जी विनम्रता के पक्के अनुयायी थे लेकिन उन्होंने इस बात को स्पष्ट कर दिया की कायरता व हिंसा में से अगर उन्हें एक चयन करना पड़े तो बह हिंसा को चुनेंगे ।
अहिंसा की परिभाषा
भारतीय सस्कृति अध्यात्म प्रधान सस्कृति है । अध्यात्म कि आत्म अहिंसा है । प्रचीन ऋषि महाऋषि से लेकर वर्तमान के महापुरुषो तक ने न केवल अहिंसात्मक भावना पर बल दिया अपितु अहिसा को आदर्श बनाने का हर सम्भव प्रयास किया है । भारत के प्राय सभी दर्शनो मे अहिंसा को अवधारणा मिलती है । विविध विद्वानो एव दार्शनिको ने अहिंसा को अपनी -2 दृष्टि से प्रभाषित करने का प्रयास किया है । योग्य दर्शन के प्रवर्तक महर्षि पंतजंलि ने अंहिसा के प्रतिफल पर प्रकाश डालते हुये यह कहा की अहिंसाप्रतिष्ठाया तत्सकत्रिधी वेत्याग अर्थात् अहिंसा प्रतिष्ठ व्यक्ति की सत्रिधि मे सब प्राणी वैर विहीन होते है बौद् धर्म, दर्शन मे भी अहिंसा को प्राण माना गया है ।
गौतम बुद् के अनुसार मैत्री और करुणा अर्थात प्राणीमात्र के प्रति प्रेम और सभी जीवो के प्रति दया का भाव हो अहिंसा है । उन्होने अहिंसात्मक कर्म को सम्यक कर्म बतलाया है तथा अंहिसा के मार्ग मे बाधक शस्त्र, प्राणी, मांस, मदिरा और विष के व्यापार को त्याज्य कहा है । सम्यक आजीविका के अन्तगर्त इन्हे वर्णित किया गया है ।
अंहिसा के आधुनिक व्याख्याकार महात्मा गांधी के शिष्य पाश्चात्य विद्वान के लाजा डलवास्टो के अनुसार समस्त जीवो के प्रति दुर्भावना का पुर्ण तिरोभाव ही अहिंसा है ।
हिंसा के दो प्रकार है 1 अर्थ हिसा 2 अनर्थ हिंसा
अर्थ हिसाः- जो व्यक्ति अपने लिए अपनी जाति, परिवार, मित्र, घर, देवता आदि के लिए त्रस स्थावर प्राणियो को स्वंय धात करता है, दुसरो से करवाता है , गात करते हुए को अच्छा समझता है, वह अर्थ हिंसा है ।
अनर्थ हिंसाः- जो व्यक्ति किसी प्राणी को अपने शरीर को रक्षा या अन्य उपयोगिता हेतु नही मारता किन्तु प्रयोजनवश, कुतुहलवश प्राणियो को मारता है, छेदन-भदेन करता है, अगों को काट डाकता है, उपद्व करता चपलतावश वनस्पतियो को उखाडता है, वह अनर्थ हिंसा है ।
अहिंसा भारतीय सस्कृति को यह धरोहर है जो मानवीय सभ्यता के उत्पन हेतु निरन्तर अवकाश प्रदान करती रही है । वास्तव मे अहिंसा का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना मानव जाति का । यधपि संसार के समस्त धर्म दार्शनिक परम्पराओ ने अहिंसा एव इसके समीपवर्ताे मुल्यो को मानव एव समाज कल्याण हेतु आवश्यक माना है । तथापि भारतीय परम्परा मे इस विषय पर जितना सुक्ष्म चिन्तन को मिलता है, वह अन्यत्र प्राप्त नही होता ।
अहिंसा की कुछ अनिवार्य शर्ते
गांधी जी के अहिंसा के सिद्धांत की कुछ अनिवार्य शर्ते है द्यउन शर्ताे का पालन किये बिना किसी व्यक्ति के लिए अहिंसा का पुजारी बनना लगभग असम्भव है । अहिंसा की कुछ अनिवार्य शर्ते है जो इस प्रकार है रू-
1. सत्य
2. आन्तरिक पवित्रता
3. व्रत रखना
4. निर्भिकता
5. त्याग की भावना
6. सुदृढ़ता
अहिंसा के व्यवहार के लिए सत्य तथा ईश्वर की करुणा में अगाध श्रद्धा का होना नितांत आवश्यक है । अहिंसा के व्रतियों के लिए यह जरुरी है की वह लोभ, दंभ, वासना, ईर्ष्या, घृणा तथा कपट से मुक्ति का पुरे मन से प्रयत्न करे। प्रत्येक अहिंसक सत्याग्रहियों के लिए अहिंसा के व्रत का पालन जरुरी है ताकि दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सके। अगर प्रेम के नियम या व्रत का पालन दृढ़ता पूर्वक किया जाये तो यह सम्पूर्ण समाज व सभ्यता को गुणात्मक व चारित्रिक उत्थान के लिए प्रेरित करता है। एक वैष्णव के रूप में ग़ांधी जी ने प्रत्येक प्राणी को पवित्र व मूल्यवान माना। यही कारण था कि उन्हें जीवन के अधिकार की पवित्रता मैं अगाध श्रद्रा थी। गांधी जी तो सांप की हत्या भी करने के पक्ष में नहीं थे। उनका कहना था की सिर्फ ईश्वर को ही जीवन लेने का अधिकार है क्योंकि सिर्फ वही जीवन दे सकता है। अहिंसा के व्रती को चाहिए की अपने विरोधियों के जीवन को भी आदर व सत्कार की भावना से देखे। अंहिसा दूसरों को कष्ट, हानि या चोट पहुचाने से बचना ही नहीं है बल्कि यह सकारात्मक आत्म – बलिदान व रचनात्मक दुःख भोग के प्राचीन सिद्धान्तो को भी अभिव्यक्त करती है। गांधी जी अहिंसा के साथ – साथ निर्भयता के पालन में विश्वास करते थे। गांधी जी के अनुसार अहिंसा की लड़ाई आत्म – बल से लड़ी जाती है जिसमे साहस, वीरता व दृढ़ता का होना अनिवार्य है।
देश की सुरक्षा एवं अहिंसा
गांधी जी भारत से अहिंसा के सिद्धान्तो के पालन की अपेक्षा रखते थे लेकिन उसका कारण यह नहीं था कि भारत राजनीतिक बेड़ियों में जकड़ा था । उनका यह विश्वास था की भारत के पास एक अविनाशी आत्मा है जी सभी दुर्बलताओं को पीछे छोड़ते हुए उत्थान के दूर्तगामी मार्ग पर आगे बढ़ सकता है । लेकिन आज़ादी के बाद गांधी जी ने निराश मन से कहा कि भारत ने सिर्फ दुर्बलों की अहिंसा को अपनाया है क्योंकि ब्रिटिश शासन के यहाँ से जाने के साथ ही असंयमी व स्वार्थी लोग पद, प्रतिष्ठा तथा लाभ के लिए हिंसक व स्वार्थपूर्ण संघर्ष में जुट गए । इन सबके बावजूद भी गांधी जी राजनीति के नैतिकीकरण तथा आध्यात्मीकरण के प्रति श्रद्धावान बने रहे तथा इस सिद्धांत के प्रति अपनी निष्ठा कायम रखी की अहिंसा ही मानवता को सम्पूर्ण बुराईयो से मुक्ति दिला सकती है ।
गांधी जी अहिंसा के प्रेमपूर्ण सिद्धान्तो पर इसलिए टिके थे क्योंकि वह मानव जाति के अस्तित्व को लेकर चिन्तित थे । अहिंसा की जरुरत जितनी आज के व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को जरुरी है । उतनी पहले कभी नही थी । आज हमारी सरंचना व्यक्ति से लेकर समाज तक और राष्ट्र से लेकर सम्पूर्ण विश्व तक संरचनात्मक हिंसा पर आधारित है । व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को एक नए अहिंसात्मक विकल्प की तलाश है । वर्तमान समय में पुरे विश्व में तानाशाही के खिलाफ जनविद्रोह ने अहिंसा को पुनः स्थापित कर दिया है । गांधी जी का अहिंसा का सिद्धांत न केवल भारत का मार्गदर्शन कर रहा है बल्कि सम्पूर्ण विश्व अहिंसा की नीति को अपना रहा है । यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नही है की गांधी जी के अहिंसा के सिद्धांत एवं उसके प्रयोग की जितनी आवश्यकता उनके जीवित रहते थी आज इसकी आवश्यकता उससे ज्यादा महसूस की जा रही है । इतिहास भी इस बात का गवाह है की हिंसा रुपी खाईयों को पाटने का काम अहिंसा रुपी पुल ही कर सकता है ।
महात्मा गांधी के अनुसार अहिंसा केवल एक दर्शन नही है बल्कि कार्य करने की एक पद्धति है, हृदय-परिवर्तन का साधन है । उन्होंने अहिंसा को व्यक्तिक आचरण तक ही सीमित न रखकर मानव- जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में लागु किया । सत्य सर्वाेच्च कानून है और अहिंसा सर्वाेच्च कर्तव्य है । सत्य की तरह अहिंसा की शक्ति असीम है । महात्मा गांधी के तीन अमोघ अस्त्र थे – सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह इनका प्रयोग उन्होंने देश को शान्तिमय तरीके से स्वराज्य तक पहुँचाने में किया ।
गांधी जी विश्व इतिहास के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने परिवर्तन के लिए अहिंसा की संस्कृति से अवगत कराया । गांधी जी अपने निधन के बाद भी न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में विद्वानो, सामाजिक कार्यकर्ताओ, मीडिया, नीति निर्माताओ का ध्यान लगातार आकृष्ट करते रहे । हमने गांधी जी के साथ ही अपने सम्मान और स्वाभिमान को भी दफ़न कर दिया है । अतः अब जरुरत इस बात की है की गांधी जी के अहिंसा की सिद्धांत को अपनाया जाये क्योंकि नाभिकीय युग में तो अहिंसा की सिद्धांत की और भी ज्यादा जरुरत है ।
संदर्भ सूची
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